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श्रीमद्भगवद्गीताधारित कर्म-योग के शैक्षिक निहितार्थ: ज्ञानार्जन, धारण एवं स्थानांतरण प्रक्रिया का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Author : सत्य नरायन यादव और डॉ. पी.एस. त्यागी

Abstract :

प्रस्तुत शोध का मूल उद्देश्य श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 3, 17 एवं 18 के आलोक में 'कर्म-प्रधान' शैक्षिक प्रतिमान का विश्लेषण करना है, जो ज्ञानार्जन (Acquisition), धारण (Retention) एवं ज्ञान के स्थानांतरण (Transfer) की कड़ियों को मनोवैज्ञानिक धरातल पर जोड़ता है। शोध यह प्रतिपादित करता है कि शिक्षा केवल सूचनात्मक संचय नहीं, अपितु 'स्वधर्म' आधारित सक्रिय कर्म की प्रक्रिया है। अध्याय ३ के अनुसार, ज्ञानार्जन की सफलता छात्र की स्वाभाविक प्रकृति (Aptitude) के अनुरूप 'नियत कर्म' में निहित है; जब विद्यार्थी बाह्य पुरस्कारों के स्थान पर श्लोक 3.17-18 के 'आत्मरति' भाव से अध्ययन को ही आनंदपूर्ण कर्म बना लेता है, तब संज्ञानात्मक अवरोध समाप्त हो जाते हैं और गहन अधिगम सुनिश्चित होता है। धारण प्रक्रिया के संदर्भ में, शोध यह सिद्ध करता है कि अध्याय १७ में वर्णित 'सात्त्विक श्रद्धा' और अनुशासित जीवनशैली ही स्मृति को स्थायित्व प्रदान करती है; चूँकि श्रद्धाहीन कर्म (अध्ययन) 'असत्' की श्रेणी में आता है, अतः केवल सात्त्विक निष्ठा ही सूचनाओं को दीर्घकालिक स्मृति में संरक्षित करने हेतु आवश्यक एकाग्रता निर्मित करती है। ज्ञान के स्थानांतरण के स्तर पर, अध्याय 18 का 'बुद्धियोग' और 'त्याग' का सिद्धांत छात्र को फलासक्ति और प्रदर्शन-चिंता (Performance Anxiety) से मुक्त करता है। यह मुक्ति छात्र को इस योग्य बनाती है कि वह विद्यालयी सिद्धांतों को व्यावहारिक जीवन और 'लोकसंग्रह' हेतु सफलतापूर्वक क्रियान्वित कर सके। अध्याय 18 की 'धृति' (धैर्य) ज्ञान के सक्रिय विनियोजन में आने वाली बाधाओं को दूर करती है। अंततः, यह अध्ययन निष्कर्ष निकालता है कि गीता का यह कर्म-योग आधारित दर्शन छात्र को 'यंत्रवत शिक्षार्थी' से 'प्रज्ञावान कर्मयोगी' के रूप में रूपांतरित करता है, जो NEP 2020 के 'अनुभवात्मक अधिगम' और 'कौशल विकास' के लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु एक सार्वभौमिक और कालातीत रूपरेखा प्रदान करता है I

Keywords :

श्रीमद्भगवद्गीता, कर्म-योग, शैक्षिक निहितार्थ, ज्ञानार्जन, धारण, स्थानान्तरण प्रक्रिया I